Sunday, 7 October 2018

ग़ज़ल संबंधित जानकारी

हिंदी और उर्दू ग़ज़ल के बीच कुछ विवादास्पद मसाइल
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अरबी,फ़ारसी और उर्दू से होते हुए ग़ज़ल हिंदी में भी अब बड़ी मजबूती से अपनी पैठ और पकड़ बना चुकी है। पिछले लगभग 3-4 वर्षों में एक से एक अच्छी गज़लें हिंदी रस्मुलख़त ( लिपि ) में पढ़ने को मिल रही हैं और ऐसी ही खूबसूरत ग़ज़लों के मज्मुए भी तेज़ी के साथ शाया हो रहे हैं। इन सब का श्रेय काफ़ी हद तक ग़ज़लकारों के साथ 2-3 वर्षों से प्रचलन में आये फिलबदीह चलाने वाले प्रबंध-तंत्र को भी जाता है जहाँ लोग तबअ आज़माई करते हैं। जदीद शायरी के इस बदलते दौर में ग़ज़ल ने अपने रिवायती लबो-लहजे के साथ अगर समझौता किया है तो भाषा तथा इल्मे-अरूज़ के नज़रिये से भी बहुत समझौते किये हैं। हालाँकि कई उस्ताद शायर कुछ के साथ तो खुलकर अपना ऐतराज़ जताते हुए दिखते हैं तो कुछ की तरफ ऊँगली उठाते हुए भी डरते हैं। इस पक्षपातपूर्ण रवैये का शिकार कुछ नए सीखने वाले होते हुए दिख रहे हैं, इसलिए यह ज़रूरी है कि इन बातों को साफ़गोई के साथ उठाया जाये।

1- न शब्द का वज़्न कुछ लोग 1 तथा कुछ लोग ना कहते हुए 2 को ठीक ठहराते हैं। हिंदी में न लिखा जाता है इस लिहाज़ से इसका वज़्न 1 हुआ मगर उर्दू में न लिखते वक़्त नून के साथ हे का इस्तेमाल होता है यानि उर्दू में न ऐसे ( نہ ) यानी ना लिखा जाता है। इन दोनों बातों के मद्देनज़र न को 1 तथा ना को 2 वज़्न पर बाँधना सहीह लगता है। लेकिन कुछ लोग इसका वज़्न 1 ही मानने पर अड़े हुए दिखते है यहाँ तक कि कुछ उर्दू दां भी, जबकि उर्दू में न के लिए सिर्फ नून लिखने का प्रावधान ही नहीं है। उनसे इस अड़ियल रवैये का कारण पूछा जाता है तो जवाब मिलता है कि मेरे उस्ताद ने यही बताया था। कोई तर्क नहीं दे पाते। है न अजीब बात। क्यों न ज़रुरत तथा तलफ़्फ़ुज़ के मुताबिक़ इसका वज़्न 1 या 2 दोनों स्वीकार किया जाए।

इस सम्बन्ध में एक उदाहरण भी देख ही लीजिये :-
इतना न दिल से मिलते,ना दिल को खो के देते।
जैसा किया था हमने वैसा ही यार पाया।
-मीर तकी मीर
इसमें न और ना दोनों का इस्तेमाल हुआ है

2- क़दीमी शायरी में शहर को शह्र पढ़ा जाता था तथा उच्चारण के आधार पर इसका वज़्न 21 लिया जाता था परन्तु इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में कोई उर्दू दां भी शहर का उच्चारण शह्र नहीं करता बल्कि सब शहर ही कहते हैं तो इसका वज़्न तलफ़्फ़ुज़ आधारित होने के कारण 12 लेने में ऐतराज़ क्यों। यही हाल ज़हर , बहर आदि अल्फ़ाज़ का भी है।

3 - लोग तक़ाबुले-रदीफ़ पर बड़ी हाय-तौबा मचाये हुए हैं आजकल। इस मुद्दे को एक उदाहरण से ही शुरू करते हैं।
मेरे ख़याल से जदीद शायरी के मशहूरो-मारूफ शायर मुनव्वर राणा साहब को आप सबने पढ़ा होगा जिनकी शायरी लोगों के दिलों पर राज कर रही है। उन्होंने तक़ाबुले रदीफ़ को बिलकुल सिरे से नकार दिया है। देखिये उनके कुछ अशआर :-

वो ग़ज़ल पढ़ने में लगता भी ग़ज़ल जैसा था।
सिर्फ ग़ज़लें नहीं लहजा भी ग़ज़ल जैसा था।
नीम का पेड़ था,बरसात थी और झूला था ,
गाँव में गुज़रा ज़माना भी ग़ज़ल जैसा था।
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समाजी बेबसी हर शह्र को मक़्तल बनाती है।
कभी नक्सल बनाती है कभी चम्बल बनाती है।
हवस महलों में रहकर भी बहुत मायूस रहती है,
क़नाअत घास को छूकर उसे मखमल बनाती है।
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ये उदाहरण ये साबित कर रहे हैं की ज़रुरत के मुताबिक़ जदीद शायरी में आयी हुई तब्दीली को भी खुले दिल से उस्ताद शायरों को आत्मसात कर लेना चाहिए।
बाते और भी हैं कहने के लिए लेकिन बाक़ी फिर कभी

साभार -कुँवर कुसुमेश सर

Thursday, 21 June 2018

ग़ज़ल संबंधित जानकारी

शेरो-शायरी में न और ना के इस्तेमाल पर बड़ी हाय तौबा मचाये हुए हैं बहुत से लोग। मैं अपने एक आलेख में पहले बता चुका हूँ कि हिंदी में तो न लिखा जा सकता है परन्तु उर्दू में न लिखते वक़्त ना (  نہ  ) यानी नून के साथ हे मिलाकर ही लिखा जाता है। फिर न के लिए लघु तथा ना के लिए दीर्घ दोनों स्वीकार क्यों नहीं कर सकते।
जो लोग ना के प्रयोग को नकार दे रहे हैं वो ज़रा निम्न शेर भी देखें :-
-1-
इतना न दिल से मिलते,ना दिल को खो के देते ,
जैसा किया था हमने वैसा ही यार पाया।
-मीर तक़ी मीर
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-2-
गर उस तरफ़ बढ़ा किसी बेदादगर का हाथ।
बाला-ए-तन रहा न इधर ना उधर का हाथ।
-अनीस

सौजन्य से कुशमेश सर

Thursday, 3 May 2018

ग़ज़ल

तुम्हारी पलकें झुकी हुई हैं।
हमारी सांसे थमी हुई हैं।।

क़दम ज़रा सा बढ़ा के देखो।
हज़ार राहें बनी हुई हैं।।

टटोलते हो क्या आदमी में।
अनाएँ सबकी मरी हुई हैं।।

मरी कहाँ है अभी मुहब्बत।
अभी तो यादें जुड़ी हुई हैं।।

करम ख़ुदा का है इसमें क्या कम।
दुआएं मां की बनी हुई हैं।।

ख़ुदा के आगे मैं रो रहा, पर।
ख़ताएँ पहले जुड़ी हुई हैं।।

ग़ुरूर जिनपे तुम्हें है अब भी।
वो तोपें कब की दगी हुई हैं।।

।।रुद्र।।

Monday, 23 April 2018

ग़ज़ल

दर्दो ग़म अब भी ज़रा मौजूद है।
इसलिये दिल मे ख़ला मौजूद है।।

बेवफ़ाई का सबब था साथ जो।
अब तलक़ वो दायरा मौजूद है।।

इन अँधेरों से निपटने के लिये।
रौशनी का एक दिया मौजूद है।।

यूँ नही कश्ती किनारे आ गयी।
उस पे तो कोई दुआ मौजूद है।।

बदगुमां नजरों से हैं सब देखते।
आखिर उसमे ऐसा क्या मौजूद है।।

ज़िन्दगी की ख़ुशमिजाजी जिंदा है।
जब तलक़ मुझमे हवा मौजूद है।।

फूल ,पत्ती ,चांद ,तारे कह रहें।
हो न हो कोई ख़ुदा मौजूद है।।

Thursday, 5 April 2018

ग़ज़ल

अश्क़ों से हम याद मिटाने बैठ गए।
तन्हाई में दिल समझाने बैठ गए।।

ख़ुद अपनी मंज़िल की जिनको ख़बर नही।
आज वही रस्ता बतलाने बैठ गए।।

वक़्त इजाज़त देता नही हमें फिर भी।
टूटे फूटे ख़्वाब सजाने बैठ गए।।

आँखे तो हैं ख़ुद ही दिल का आईना।
नाहक तुम यूँ राज़ छुपाने बैठ गए।।

इस मंज़र पर उसकी रहमत झूम उठी।
बच्चे माँओं के सरहाने बैठ गए।।

सात जनम की कसमें खाने की ख़ातिर।
पास में आकर दो अनजाने बैठ गए।।

साँझ ढले छाया है जब से सन्नाटा।
पक्षी भी घर में सुस्ताने बैठ गए।।

Thursday, 22 March 2018

ग़ज़ल

ज़िन्दगी! तुझको छल रहा हूँ मैं।
इसलिये ख़ुद बदल रहा हूँ मैं।।

तेरी राहों में रौशनी ख़ातिर।
देख सूरज सा जल रहा हूँ मैं।।

मंज़िलों राह देखना मेरी।
अब सफ़र पे निकल रहा हूँ मैं।

देख दुनिया की ऐसी आबो हवा।
रफ़्ता रफ़्ता बदल रहा हूँ मैं।।

मंज़िलें हैं करीब आने को।
रेत सा पर फिसल रहा हूँ मैं।।

Monday, 19 February 2018

ग़ज़ल

धूप खुशियों की ग़म का साया है।
और क्या ज़िन्दगी में रक्खा है।।

खुल के जी ले तू ज़िन्दगी अपनी।
आख़िरश मौत ही ठिकाना है।।

चोट खाई हो इश्क में जिसने।
इश्क़ का लफ़्ज़ उसे अखरता है।।

चांद, सूरज ,जमीं ,सितारों में।
हर तरफ आज उसका चर्चा है।।

मुश्किलें आती हैं तो आ जाएं।
कौन इतना भी उनसे डरता है।।

चंद पल ही ठहर ठहर तो सही।
काम दिल का अभी अधूरा है।।

Saturday, 17 February 2018

ग़ज़ल

हवा को मुट्ठी में कसकर दबाना चाहता है।
वो आसमान को नीचे झुकाना चाहता है।।

नसीब खेल रहा है हमारे जीवन से।
बदल बदल के तमाशे दिखाना चाहता है।।

उसे बिठाए हुए हूँ मैं अपने कंधों पर।
न जाने फिर वो मुझे क्यों गिराना चाहता है।।

सफ़र में उठता दिखा है मुसीबतों का पहाड़।
ग़ुबार बन के मुझे जो मिटाना चाहता है।।

सलाम भेज रहा है हवा के साथ मुझे।
यही कहीं है वो मुझको बताना चाहता है।।

मिठास घोल दे दरिया तू आ के पानी में।
कि खारा पन ये समन्दर मिटाना चाहता है।।

क़रीब देख के मुद्दत के बाद बच्चे को।
शजर ये और भी डाली झुकाना चाहता है।।

Thursday, 1 February 2018

ग़ज़ल

मुस्कुराहट किसी गमख़्वार को दे देता हूँ।
हर ख़ुशी अपनी तलबगार को दे देता हूँ।।

तन लगाता हूँ निवालों को कमाने के लिये।
और मन अपने मैं परिवार को दे देता हूँ।।

हर दुआ बनके दुआ करती है दूजे पे असर।
जब ये दौलत किसी बीमार को दे देता हूँ।।

दिल किसी का न दुखे मेरा यही मक़सद है।
इक  हवाला  यूँ मैं क़िरदार को  दे देता हूँ।।

जो भी मिलता है लगा लेता हूँ दिल से अपने।
प्यार कुछ ऐसे मैं लाचार को दे देता हूँ।।

Friday, 26 January 2018

ग़ज़ल

मुस्कुराहट मेरे रंजो ग़म छुपाती रोज़ है।
जैसे तैसे ही सही इज़्ज़त बचाती रोज़ है।।

ओढ़कर दिन की थकन मैं रात को सोता हूँ तो।
माँ हवा के साज़ पे लोरी सुनाती रोज़ है।।

हाले दिल मेरा सुनाना ग़र मेरा बचपन मिले।
अय हवा तू उस तरफ से आती जाती रोज़ है।

छोड़कर तो आ गये हैं हम दरो दीवार, पर।
माँ हमें हर शाम को घर से बुलाती रोज़ है।।

ज़िन्दगी !दो पल सुकूँ के जी तो लेने दे मुझे।
मौत की तू धार पे वैसे   बिठाती रोज़ है।।

मुफ़लिसी तो फ़ीस दे पाई नहीं इस्कूल की।
फिर भी वो बच्ची किताबों को सज़ाती रोज़ है।।

अच्छे दिन की चाहतें मरने नहीं देती हमें।
यह सियासत दाँव ऐसा लेके आती रोज़ है।।

Saturday, 20 January 2018

ग़ज़ल संबंधी जानकारी

तहलीली रदीफ़
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ग़ज़ल कहने वाले रदीफ़ तो जानते हैं मगर तहलीली रदीफ़ से कम लोग वाक़िफ़ हैं। तो देखिये तहलीली रदीफ़ क्या होता है।
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जब रदीफ़ इस तरह से क़ाफिये के बाद आये कि वह क़ाफिये में जज़्ब हो जाए... सरल शब्दों में कहा जाए तो मिक्स (MIX) हो जाए तो ऐसे रदीफ़ को तहलीली रदीफ़ कहते हैं।
उदाहरण-1
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डाल दे साया अपने आँचल का।
नातवाँ हूँ कफ़न भी हो हल्का।।
-नासिख़
इस मतले के शेर से ये स्पष्ट है कि आँचल क़ाफ़िया है और "ल" उस क़ाफ़िये का हर्फ़े-रवी है तथा "का" रदीफ़ है। मिसरा सानी का हल्का शब्द ऐसा शब्द है जिसमे क़ाफ़िये के हर्फ़े-रवी "ल" के साथ रदीफ़ "का" बिलकुल चिपक कर यानी MIX होकर आ रहा है। अतः मिसरा सानी का "का" तहलीली रदीफ़ है।
उदाहरण-2
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इस क़दर होशियार तुम हो क़र।
राहे-उल्फ़त में खा रहे ठोकर।।
-जर्रार तिलहरी
यहाँ तहलीली रदीफ़ क्या है अब आप बताइये अगर समझ गए हैं तो...:)
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-कुँवर कुसुमेश सर के सौजन्य से

Tuesday, 9 January 2018

ग़ज़ल से सम्बंधित जानकारी

ग़ज़ल एक लाजवाब सिन्फ़े-सुखन (काव्य की विधा) है। अरबी,फ़ारसी,तथा उर्दू से होते हुए पिछले लगभग 3-4 दशकों के दौरान हिंदी में भी बहुत अच्छी ग़ज़लें कही जा रही हैं। इसमें बहुत बड़ा योगदान ब्लॉग, फेसबुक तथा फेसबुक पर चल रहे फ़िलबदीह मुशायरे को जाता है। इनके कारण वो लोग खुलकर सामने आये जो ग़ज़ल सीखना चाह रहे थे। इन प्लेटफॉर्म पर तबअ आज़माई के दौरान कुछ जानकार इस्लाह भी कर देते हैं ,यह भी नवोदित के लिए लाभदायक है। लोगों में अब ग़ज़ल की बारीकियाँ जानने की इच्छा भी ज़ोर मारने लगी है जो स्वाभाविक है। ग़ज़ल का बुनियादी ढाँचा अरबी,फ़ारसी तथा उर्दू का होने के कारण तथा लेखक का भाषा विशेष के प्रति ख़ास रुझान होने के कारण अरूज़ की जो किताबे मार्केट में उपलब्ध हुई वो या तो उर्दूमय हो कर रह गईं या शुद्ध हिंदीमय हो गईं। वास्तव में ज़रुरत आमफ़हम की भाषा में किताब की है जो हिंदी के ग़ज़लकारों के ग़ज़ल ज्ञान में तेज़ी से और आसानी से इज़ाफ़ा कर सके, जिसके वो हक़दार हैं।
यह तभी संभव है जब अरूज़ की किताब कोई ऐसा हिन्दी-प्रेमी निकाले जिसे उर्दू का भी अच्छा ज्ञान हो।

-कुँवर कुसुमेश सर के सौजन्य से

Saturday, 6 January 2018

ग़ज़ल से संबंधित जानकारी

शेर के ऐब
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कुछ लोग ये भ्रम पाल के शायरी कर रहे हैं कि मुश्किल और क्लिष्ट शब्दों के इस्तेमाल से खूबसूरत और प्रभावी शेर कहे जा सकते हैं जबकि भारी-भरकम शब्दों के मोह में लोग अक्सर शेर का सत्यानाश कर देते हैं परिणामस्वरूप शेर में ये ऐब पैदा हो जाते हैं :-
1 - ताकीदे-लफ़्ज़ी :- कर्ता ,कर्म और क्रिया को ग़लत क्रम में लिखना यानी शब्दों को बहर में लाने के चक्कर में शब्दों को ग़लत क्रम में लिखने से ये ऐब पैदा हो जाता है। इसके कारण शेर का अर्थ अस्पष्ट हो जाता है और सारा मज़ा किरकिरा हो जाता है।
उदाहरण 
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दोषपूर्ण मिसरा
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गुज़र चुके हैं तो क्या ग़म बहार के लम्हे

सही मिसरा
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गुज़र चुके हैं बहारों के पल तो क्या ग़म है

2 - हज़्फ़े -लफ़्ज़ ;-किसी मिसरे में किसी शब्द की कमी महसूस होने को हज़्फ़े-लफ़्ज़ कहते हैं।
उदाहरण
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दोषपूर्ण मिसरा
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दास्ताने-ग़म सुनाना चाहता ( इस मिसरे में "है" शब्द की कमी खल रही है हालाँकि मिसरा ख़ास बहर में है )

सही मिसरा
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दास्ताने-ग़म सुनाना चाहता हूँ
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-कुँवर कुसुमेश सर के सौजन्य से

ग़ज़ल

दिल के टुकड़े हज़ार  कौन करे।
जिंदगी ! तुझसे प्यार कौन करे।।

वक़्त मिलता नही मियां अब तो।
सरहदें दिल की पार कौन करे।।

है ये  कानून  अंधा और बहरा।
न्याय की फिर गुहार कौन करे।।

मुद्दतों बाद आज संभले हैं।
जिंदगी और ख़्वार कौन करे।।

मैं तो हूँ एक डूबता सूरज।
मुझको आला शुमार कौन करे।।

पहले से खाईयां दिलो में हैं।
तो  बता अब दरार कौन करे।।

मुद्दतों बाद मिल सकी है ख़ुशी।
यह भी उस पे निसार कौन करे।।