Saturday, 6 January 2018

ग़ज़ल से संबंधित जानकारी

शेर के ऐब
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कुछ लोग ये भ्रम पाल के शायरी कर रहे हैं कि मुश्किल और क्लिष्ट शब्दों के इस्तेमाल से खूबसूरत और प्रभावी शेर कहे जा सकते हैं जबकि भारी-भरकम शब्दों के मोह में लोग अक्सर शेर का सत्यानाश कर देते हैं परिणामस्वरूप शेर में ये ऐब पैदा हो जाते हैं :-
1 - ताकीदे-लफ़्ज़ी :- कर्ता ,कर्म और क्रिया को ग़लत क्रम में लिखना यानी शब्दों को बहर में लाने के चक्कर में शब्दों को ग़लत क्रम में लिखने से ये ऐब पैदा हो जाता है। इसके कारण शेर का अर्थ अस्पष्ट हो जाता है और सारा मज़ा किरकिरा हो जाता है।
उदाहरण 
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दोषपूर्ण मिसरा
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गुज़र चुके हैं तो क्या ग़म बहार के लम्हे

सही मिसरा
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गुज़र चुके हैं बहारों के पल तो क्या ग़म है

2 - हज़्फ़े -लफ़्ज़ ;-किसी मिसरे में किसी शब्द की कमी महसूस होने को हज़्फ़े-लफ़्ज़ कहते हैं।
उदाहरण
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दोषपूर्ण मिसरा
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दास्ताने-ग़म सुनाना चाहता ( इस मिसरे में "है" शब्द की कमी खल रही है हालाँकि मिसरा ख़ास बहर में है )

सही मिसरा
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दास्ताने-ग़म सुनाना चाहता हूँ
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-कुँवर कुसुमेश सर के सौजन्य से

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