हिंदी और उर्दू ग़ज़ल के बीच कुछ विवादास्पद मसाइल
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अरबी,फ़ारसी और उर्दू से होते हुए ग़ज़ल हिंदी में भी अब बड़ी मजबूती से अपनी पैठ और पकड़ बना चुकी है। पिछले लगभग 3-4 वर्षों में एक से एक अच्छी गज़लें हिंदी रस्मुलख़त ( लिपि ) में पढ़ने को मिल रही हैं और ऐसी ही खूबसूरत ग़ज़लों के मज्मुए भी तेज़ी के साथ शाया हो रहे हैं। इन सब का श्रेय काफ़ी हद तक ग़ज़लकारों के साथ 2-3 वर्षों से प्रचलन में आये फिलबदीह चलाने वाले प्रबंध-तंत्र को भी जाता है जहाँ लोग तबअ आज़माई करते हैं। जदीद शायरी के इस बदलते दौर में ग़ज़ल ने अपने रिवायती लबो-लहजे के साथ अगर समझौता किया है तो भाषा तथा इल्मे-अरूज़ के नज़रिये से भी बहुत समझौते किये हैं। हालाँकि कई उस्ताद शायर कुछ के साथ तो खुलकर अपना ऐतराज़ जताते हुए दिखते हैं तो कुछ की तरफ ऊँगली उठाते हुए भी डरते हैं। इस पक्षपातपूर्ण रवैये का शिकार कुछ नए सीखने वाले होते हुए दिख रहे हैं, इसलिए यह ज़रूरी है कि इन बातों को साफ़गोई के साथ उठाया जाये।
1- न शब्द का वज़्न कुछ लोग 1 तथा कुछ लोग ना कहते हुए 2 को ठीक ठहराते हैं। हिंदी में न लिखा जाता है इस लिहाज़ से इसका वज़्न 1 हुआ मगर उर्दू में न लिखते वक़्त नून के साथ हे का इस्तेमाल होता है यानि उर्दू में न ऐसे ( نہ ) यानी ना लिखा जाता है। इन दोनों बातों के मद्देनज़र न को 1 तथा ना को 2 वज़्न पर बाँधना सहीह लगता है। लेकिन कुछ लोग इसका वज़्न 1 ही मानने पर अड़े हुए दिखते है यहाँ तक कि कुछ उर्दू दां भी, जबकि उर्दू में न के लिए सिर्फ नून लिखने का प्रावधान ही नहीं है। उनसे इस अड़ियल रवैये का कारण पूछा जाता है तो जवाब मिलता है कि मेरे उस्ताद ने यही बताया था। कोई तर्क नहीं दे पाते। है न अजीब बात। क्यों न ज़रुरत तथा तलफ़्फ़ुज़ के मुताबिक़ इसका वज़्न 1 या 2 दोनों स्वीकार किया जाए।
इस सम्बन्ध में एक उदाहरण भी देख ही लीजिये :-
इतना न दिल से मिलते,ना दिल को खो के देते।
जैसा किया था हमने वैसा ही यार पाया।
-मीर तकी मीर
इसमें न और ना दोनों का इस्तेमाल हुआ है
2- क़दीमी शायरी में शहर को शह्र पढ़ा जाता था तथा उच्चारण के आधार पर इसका वज़्न 21 लिया जाता था परन्तु इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में कोई उर्दू दां भी शहर का उच्चारण शह्र नहीं करता बल्कि सब शहर ही कहते हैं तो इसका वज़्न तलफ़्फ़ुज़ आधारित होने के कारण 12 लेने में ऐतराज़ क्यों। यही हाल ज़हर , बहर आदि अल्फ़ाज़ का भी है।
3 - लोग तक़ाबुले-रदीफ़ पर बड़ी हाय-तौबा मचाये हुए हैं आजकल। इस मुद्दे को एक उदाहरण से ही शुरू करते हैं।
मेरे ख़याल से जदीद शायरी के मशहूरो-मारूफ शायर मुनव्वर राणा साहब को आप सबने पढ़ा होगा जिनकी शायरी लोगों के दिलों पर राज कर रही है। उन्होंने तक़ाबुले रदीफ़ को बिलकुल सिरे से नकार दिया है। देखिये उनके कुछ अशआर :-
वो ग़ज़ल पढ़ने में लगता भी ग़ज़ल जैसा था।
सिर्फ ग़ज़लें नहीं लहजा भी ग़ज़ल जैसा था।
नीम का पेड़ था,बरसात थी और झूला था ,
गाँव में गुज़रा ज़माना भी ग़ज़ल जैसा था।
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समाजी बेबसी हर शह्र को मक़्तल बनाती है।
कभी नक्सल बनाती है कभी चम्बल बनाती है।
हवस महलों में रहकर भी बहुत मायूस रहती है,
क़नाअत घास को छूकर उसे मखमल बनाती है।
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ये उदाहरण ये साबित कर रहे हैं की ज़रुरत के मुताबिक़ जदीद शायरी में आयी हुई तब्दीली को भी खुले दिल से उस्ताद शायरों को आत्मसात कर लेना चाहिए।
बाते और भी हैं कहने के लिए लेकिन बाक़ी फिर कभी
साभार -कुँवर कुसुमेश सर
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