Friday, 26 January 2018

ग़ज़ल

मुस्कुराहट मेरे रंजो ग़म छुपाती रोज़ है।
जैसे तैसे ही सही इज़्ज़त बचाती रोज़ है।।

ओढ़कर दिन की थकन मैं रात को सोता हूँ तो।
माँ हवा के साज़ पे लोरी सुनाती रोज़ है।।

हाले दिल मेरा सुनाना ग़र मेरा बचपन मिले।
अय हवा तू उस तरफ से आती जाती रोज़ है।

छोड़कर तो आ गये हैं हम दरो दीवार, पर।
माँ हमें हर शाम को घर से बुलाती रोज़ है।।

ज़िन्दगी !दो पल सुकूँ के जी तो लेने दे मुझे।
मौत की तू धार पे वैसे   बिठाती रोज़ है।।

मुफ़लिसी तो फ़ीस दे पाई नहीं इस्कूल की।
फिर भी वो बच्ची किताबों को सज़ाती रोज़ है।।

अच्छे दिन की चाहतें मरने नहीं देती हमें।
यह सियासत दाँव ऐसा लेके आती रोज़ है।।

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