धूप खुशियों की ग़म का साया है।
और क्या ज़िन्दगी में रक्खा है।।
खुल के जी ले तू ज़िन्दगी अपनी।
आख़िरश मौत ही ठिकाना है।।
चोट खाई हो इश्क में जिसने।
इश्क़ का लफ़्ज़ उसे अखरता है।।
चांद, सूरज ,जमीं ,सितारों में।
हर तरफ आज उसका चर्चा है।।
मुश्किलें आती हैं तो आ जाएं।
कौन इतना भी उनसे डरता है।।
चंद पल ही ठहर ठहर तो सही।
काम दिल का अभी अधूरा है।।
No comments:
Post a Comment