Tuesday, 9 January 2018

ग़ज़ल से सम्बंधित जानकारी

ग़ज़ल एक लाजवाब सिन्फ़े-सुखन (काव्य की विधा) है। अरबी,फ़ारसी,तथा उर्दू से होते हुए पिछले लगभग 3-4 दशकों के दौरान हिंदी में भी बहुत अच्छी ग़ज़लें कही जा रही हैं। इसमें बहुत बड़ा योगदान ब्लॉग, फेसबुक तथा फेसबुक पर चल रहे फ़िलबदीह मुशायरे को जाता है। इनके कारण वो लोग खुलकर सामने आये जो ग़ज़ल सीखना चाह रहे थे। इन प्लेटफॉर्म पर तबअ आज़माई के दौरान कुछ जानकार इस्लाह भी कर देते हैं ,यह भी नवोदित के लिए लाभदायक है। लोगों में अब ग़ज़ल की बारीकियाँ जानने की इच्छा भी ज़ोर मारने लगी है जो स्वाभाविक है। ग़ज़ल का बुनियादी ढाँचा अरबी,फ़ारसी तथा उर्दू का होने के कारण तथा लेखक का भाषा विशेष के प्रति ख़ास रुझान होने के कारण अरूज़ की जो किताबे मार्केट में उपलब्ध हुई वो या तो उर्दूमय हो कर रह गईं या शुद्ध हिंदीमय हो गईं। वास्तव में ज़रुरत आमफ़हम की भाषा में किताब की है जो हिंदी के ग़ज़लकारों के ग़ज़ल ज्ञान में तेज़ी से और आसानी से इज़ाफ़ा कर सके, जिसके वो हक़दार हैं।
यह तभी संभव है जब अरूज़ की किताब कोई ऐसा हिन्दी-प्रेमी निकाले जिसे उर्दू का भी अच्छा ज्ञान हो।

-कुँवर कुसुमेश सर के सौजन्य से

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