Saturday, 17 February 2018

ग़ज़ल

हवा को मुट्ठी में कसकर दबाना चाहता है।
वो आसमान को नीचे झुकाना चाहता है।।

नसीब खेल रहा है हमारे जीवन से।
बदल बदल के तमाशे दिखाना चाहता है।।

उसे बिठाए हुए हूँ मैं अपने कंधों पर।
न जाने फिर वो मुझे क्यों गिराना चाहता है।।

सफ़र में उठता दिखा है मुसीबतों का पहाड़।
ग़ुबार बन के मुझे जो मिटाना चाहता है।।

सलाम भेज रहा है हवा के साथ मुझे।
यही कहीं है वो मुझको बताना चाहता है।।

मिठास घोल दे दरिया तू आ के पानी में।
कि खारा पन ये समन्दर मिटाना चाहता है।।

क़रीब देख के मुद्दत के बाद बच्चे को।
शजर ये और भी डाली झुकाना चाहता है।।

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