Saturday, 6 January 2018

ग़ज़ल

दिल के टुकड़े हज़ार  कौन करे।
जिंदगी ! तुझसे प्यार कौन करे।।

वक़्त मिलता नही मियां अब तो।
सरहदें दिल की पार कौन करे।।

है ये  कानून  अंधा और बहरा।
न्याय की फिर गुहार कौन करे।।

मुद्दतों बाद आज संभले हैं।
जिंदगी और ख़्वार कौन करे।।

मैं तो हूँ एक डूबता सूरज।
मुझको आला शुमार कौन करे।।

पहले से खाईयां दिलो में हैं।
तो  बता अब दरार कौन करे।।

मुद्दतों बाद मिल सकी है ख़ुशी।
यह भी उस पे निसार कौन करे।।

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