Monday, 23 April 2018

ग़ज़ल

दर्दो ग़म अब भी ज़रा मौजूद है।
इसलिये दिल मे ख़ला मौजूद है।।

बेवफ़ाई का सबब था साथ जो।
अब तलक़ वो दायरा मौजूद है।।

इन अँधेरों से निपटने के लिये।
रौशनी का एक दिया मौजूद है।।

यूँ नही कश्ती किनारे आ गयी।
उस पे तो कोई दुआ मौजूद है।।

बदगुमां नजरों से हैं सब देखते।
आखिर उसमे ऐसा क्या मौजूद है।।

ज़िन्दगी की ख़ुशमिजाजी जिंदा है।
जब तलक़ मुझमे हवा मौजूद है।।

फूल ,पत्ती ,चांद ,तारे कह रहें।
हो न हो कोई ख़ुदा मौजूद है।।

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