Saturday, 28 January 2017

ग़ज़ल

ग़मों की आँच से तड़पी हुई सी।
वो अब तक है ज़रा सहमी हुई सी।।

कुरेदो और तुम ज़ख़्मों को यारो।
हमारी आह है हलकी हुई सी।।

जहाँ किलकारियाँ थीं अब वहाँ पर
हैं कुछ ख़ामोशियाँ चुभती हुई सी |

जो पाया है खुला आकाश इसने।
है चिड़िया आज कुछ मचली हुई सी।।

हज़ारों ग़म समेटे इस जहाँ के।
दिखी ऊपर से माँ हँसती हुई सी।।

हुई आहट तेरे आने की शायद।
फ़िज़ा लगती है अब महकी हुई सी।।

मुक़द्दर की तुम्हें कैसे बताएं।
है सीधी राह भी टेढ़ी हुई सी।।
गौरव पाण्डेय रूद्र

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