Monday, 9 January 2017

ग़ज़ल

अब तलक़ दिल में दबे अंगार तेरे शह्र में।
हो गए कुरबान  ये  घर-बार तेरे शह्र में।।

अम्न की दरकार का था मुद्दआ जिनका यहाँ।
आज उछली उनकी भी दस्तार तेरे शह्र में।।

मुद्दतों के बाद अश्क़ों ने दिखाया जोर भी।
एक जब सैलाब आया यार तेरे शह्र में।।

इक मुझे ही दफ़्न करके क्या मिलेगा यार,जब।
इश्क़ के लाखों भरे बीमार तेरे शह्र में।।

सजदा चौखट पर तेरी करके गया जो भी यहाँ।
कम नही उसका हुआ मेयार तेरे शह्र में।।

कब तलक़ ढकता रहेगा ज़ुल्म को परदे से तू।
हो कभी ये  जायेगा अखबार तेरे शह्र में।।

वहशतों के दौर में कैसे बचाऊं मैं अना।
हर गली,नुक्कड़ पे हैं बाज़ार तेरे शह्र में।।

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