कोई सपना शायद उसका टूटा लगता है।
इस ख़ातिर महफ़िल में भी वो बहका लगता है।।
बेटों का रस्ता जब माएँ तकती दिखती हैं।
उनसे पूछो त्योहारों में कैसा लगता है।।
जैसे तैसे कट जातें हैं दिन तो अपने ,पर।
शाम ढले यादों का तेरी जत्था लगता है।।
लाखों खुशियाँ हो दुनिया की सबके घर में,पर।
बेटी के बिन सबका आंगन सूना लगता है।।
जिसको देखो भाग रहा है उस से जाने क्यों।
शायद उसके हाथों में आईना लगता है।।
आँखों में बस क़ैद वही है सूरत अनजानी।
कोई मिलता वो मुझको बस अपना लगता है।
गौरव पांडेय रूद्र
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