ख़ुशनुमा मंज़र दिखाओ तुम ज़रा।
ज़ख़्म पर मरहम लगाओ तुम ज़रा।।
इन दिनों मैं हूँ मजे में बारहा।
दर्दो ग़म को पास लाओ तुम ज़रा।।
आँसुओं का यह समुन्दर बह सके।
दूरियां कुछ यूँ बढ़ाओ तुम ज़रा।।
मर रही इंसानियत के वास्ते।
आस का दीपक जलाओ तुम ज़रा।।
है नही मुमकिन हक़ीक़त में मगर।
ख़्वाब में तो आओ जाओ तुम ज़रा।
मुश्किलें आसान सब हो जाएंगी।
दो क़दम तो साथ आओ तुम ज़रा।।
मैं शुमार आदत में अपनी कर सकूं।
रूद्र कुछ ऐसा सिखाओ तुम जरा।।
गौरव पांडेय रूद्र
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