Wednesday, 27 December 2017

ग़ज़ल

न सोचा था बदल जाएगा इतना भी जुदा होकर।
मिला वो हमसे तो लेकिन मिला हमसे ख़फ़ा होकर।।

सदा कुचला गया हूँ मैं यहाँ अपने परायों में।
किसी का रास्ता होकर किसी का वास्ता होकर।।

ख़ुदाया बक्श दे इस ज़ीस्त को इक अज़्म ऐसा भी।
चलूँ मै साथ मंजिल तक सभी का रास्ता होकर।।

बुलन्दी के लिए पंछी ठिकाना छोड़ आया था।
मगर पछता रहा है आज वो घर से जुदा होकर।।

शराफत ,शर्म, ईमाँ, प्यार को यूँ ताक पे रख के।
करेगा क्या बता मुझको तू इतना भी बड़ा होकर।।

वो कहता है कि दुनिया के लिये तू आईना हो जा।
मैं कहता हूं न जीने देगी दुनिया आईना होकर।।

सभी के दिल में ये मासूम ख़्वाहिश पलती रहती है।
जिऊँ मैं ज़िन्दगी ताउम्र माँ का लाडला होकर।।

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