Friday, 26 January 2018

ग़ज़ल

मुस्कुराहट मेरे रंजो ग़म छुपाती रोज़ है।
जैसे तैसे ही सही इज़्ज़त बचाती रोज़ है।।

ओढ़कर दिन की थकन मैं रात को सोता हूँ तो।
माँ हवा के साज़ पे लोरी सुनाती रोज़ है।।

हाले दिल मेरा सुनाना ग़र मेरा बचपन मिले।
अय हवा तू उस तरफ से आती जाती रोज़ है।

छोड़कर तो आ गये हैं हम दरो दीवार, पर।
माँ हमें हर शाम को घर से बुलाती रोज़ है।।

ज़िन्दगी !दो पल सुकूँ के जी तो लेने दे मुझे।
मौत की तू धार पे वैसे   बिठाती रोज़ है।।

मुफ़लिसी तो फ़ीस दे पाई नहीं इस्कूल की।
फिर भी वो बच्ची किताबों को सज़ाती रोज़ है।।

अच्छे दिन की चाहतें मरने नहीं देती हमें।
यह सियासत दाँव ऐसा लेके आती रोज़ है।।

Saturday, 20 January 2018

ग़ज़ल संबंधी जानकारी

तहलीली रदीफ़
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ग़ज़ल कहने वाले रदीफ़ तो जानते हैं मगर तहलीली रदीफ़ से कम लोग वाक़िफ़ हैं। तो देखिये तहलीली रदीफ़ क्या होता है।
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जब रदीफ़ इस तरह से क़ाफिये के बाद आये कि वह क़ाफिये में जज़्ब हो जाए... सरल शब्दों में कहा जाए तो मिक्स (MIX) हो जाए तो ऐसे रदीफ़ को तहलीली रदीफ़ कहते हैं।
उदाहरण-1
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डाल दे साया अपने आँचल का।
नातवाँ हूँ कफ़न भी हो हल्का।।
-नासिख़
इस मतले के शेर से ये स्पष्ट है कि आँचल क़ाफ़िया है और "ल" उस क़ाफ़िये का हर्फ़े-रवी है तथा "का" रदीफ़ है। मिसरा सानी का हल्का शब्द ऐसा शब्द है जिसमे क़ाफ़िये के हर्फ़े-रवी "ल" के साथ रदीफ़ "का" बिलकुल चिपक कर यानी MIX होकर आ रहा है। अतः मिसरा सानी का "का" तहलीली रदीफ़ है।
उदाहरण-2
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इस क़दर होशियार तुम हो क़र।
राहे-उल्फ़त में खा रहे ठोकर।।
-जर्रार तिलहरी
यहाँ तहलीली रदीफ़ क्या है अब आप बताइये अगर समझ गए हैं तो...:)
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-कुँवर कुसुमेश सर के सौजन्य से

Tuesday, 9 January 2018

ग़ज़ल से सम्बंधित जानकारी

ग़ज़ल एक लाजवाब सिन्फ़े-सुखन (काव्य की विधा) है। अरबी,फ़ारसी,तथा उर्दू से होते हुए पिछले लगभग 3-4 दशकों के दौरान हिंदी में भी बहुत अच्छी ग़ज़लें कही जा रही हैं। इसमें बहुत बड़ा योगदान ब्लॉग, फेसबुक तथा फेसबुक पर चल रहे फ़िलबदीह मुशायरे को जाता है। इनके कारण वो लोग खुलकर सामने आये जो ग़ज़ल सीखना चाह रहे थे। इन प्लेटफॉर्म पर तबअ आज़माई के दौरान कुछ जानकार इस्लाह भी कर देते हैं ,यह भी नवोदित के लिए लाभदायक है। लोगों में अब ग़ज़ल की बारीकियाँ जानने की इच्छा भी ज़ोर मारने लगी है जो स्वाभाविक है। ग़ज़ल का बुनियादी ढाँचा अरबी,फ़ारसी तथा उर्दू का होने के कारण तथा लेखक का भाषा विशेष के प्रति ख़ास रुझान होने के कारण अरूज़ की जो किताबे मार्केट में उपलब्ध हुई वो या तो उर्दूमय हो कर रह गईं या शुद्ध हिंदीमय हो गईं। वास्तव में ज़रुरत आमफ़हम की भाषा में किताब की है जो हिंदी के ग़ज़लकारों के ग़ज़ल ज्ञान में तेज़ी से और आसानी से इज़ाफ़ा कर सके, जिसके वो हक़दार हैं।
यह तभी संभव है जब अरूज़ की किताब कोई ऐसा हिन्दी-प्रेमी निकाले जिसे उर्दू का भी अच्छा ज्ञान हो।

-कुँवर कुसुमेश सर के सौजन्य से

Saturday, 6 January 2018

ग़ज़ल से संबंधित जानकारी

शेर के ऐब
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कुछ लोग ये भ्रम पाल के शायरी कर रहे हैं कि मुश्किल और क्लिष्ट शब्दों के इस्तेमाल से खूबसूरत और प्रभावी शेर कहे जा सकते हैं जबकि भारी-भरकम शब्दों के मोह में लोग अक्सर शेर का सत्यानाश कर देते हैं परिणामस्वरूप शेर में ये ऐब पैदा हो जाते हैं :-
1 - ताकीदे-लफ़्ज़ी :- कर्ता ,कर्म और क्रिया को ग़लत क्रम में लिखना यानी शब्दों को बहर में लाने के चक्कर में शब्दों को ग़लत क्रम में लिखने से ये ऐब पैदा हो जाता है। इसके कारण शेर का अर्थ अस्पष्ट हो जाता है और सारा मज़ा किरकिरा हो जाता है।
उदाहरण 
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दोषपूर्ण मिसरा
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गुज़र चुके हैं तो क्या ग़म बहार के लम्हे

सही मिसरा
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गुज़र चुके हैं बहारों के पल तो क्या ग़म है

2 - हज़्फ़े -लफ़्ज़ ;-किसी मिसरे में किसी शब्द की कमी महसूस होने को हज़्फ़े-लफ़्ज़ कहते हैं।
उदाहरण
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दोषपूर्ण मिसरा
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दास्ताने-ग़म सुनाना चाहता ( इस मिसरे में "है" शब्द की कमी खल रही है हालाँकि मिसरा ख़ास बहर में है )

सही मिसरा
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दास्ताने-ग़म सुनाना चाहता हूँ
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-कुँवर कुसुमेश सर के सौजन्य से

ग़ज़ल

दिल के टुकड़े हज़ार  कौन करे।
जिंदगी ! तुझसे प्यार कौन करे।।

वक़्त मिलता नही मियां अब तो।
सरहदें दिल की पार कौन करे।।

है ये  कानून  अंधा और बहरा।
न्याय की फिर गुहार कौन करे।।

मुद्दतों बाद आज संभले हैं।
जिंदगी और ख़्वार कौन करे।।

मैं तो हूँ एक डूबता सूरज।
मुझको आला शुमार कौन करे।।

पहले से खाईयां दिलो में हैं।
तो  बता अब दरार कौन करे।।

मुद्दतों बाद मिल सकी है ख़ुशी।
यह भी उस पे निसार कौन करे।।