Thursday, 28 December 2017

ग़ज़ल

हौसला जिसका बिखरता रह गया।
वो सदा मंज़िल का प्यासा रह गया।।

जो अना का सौदा कर पाया नही।
मुफ़लिसी का वो ही मारा रह गया।।

दिल तो आख़िर दिल है इसका क्या करें।
अपनो, ग़ैरों में उलझता रह गया।।

इश्क़ की चौसर भी साहिब ख़ूब है।
जो भी खेला वो ही फसता रह गया।।

क्यों बग़ावत पर उतर आई नदी।
जो समंदर आज प्यासा रह गया।।

सच की आख़िर ताजपोशी हो गयी।
झूठ हरसू गिड़गिड़ाता रह गया।।

अपनी ख़ुशियों में रहे मशगूल वो।
मैं ग़मे दिल ही सुनाता  रह गया।।

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