Saturday, 28 January 2017

ग़ज़ल

ग़मों की आँच से तड़पी हुई सी।
वो अब तक है ज़रा सहमी हुई सी।।

कुरेदो और तुम ज़ख़्मों को यारो।
हमारी आह है हलकी हुई सी।।

जहाँ किलकारियाँ थीं अब वहाँ पर
हैं कुछ ख़ामोशियाँ चुभती हुई सी |

जो पाया है खुला आकाश इसने।
है चिड़िया आज कुछ मचली हुई सी।।

हज़ारों ग़म समेटे इस जहाँ के।
दिखी ऊपर से माँ हँसती हुई सी।।

हुई आहट तेरे आने की शायद।
फ़िज़ा लगती है अब महकी हुई सी।।

मुक़द्दर की तुम्हें कैसे बताएं।
है सीधी राह भी टेढ़ी हुई सी।।
गौरव पाण्डेय रूद्र

Wednesday, 18 January 2017

ग़ज़ल

कोई सपना शायद उसका  टूटा लगता है।
इस ख़ातिर महफ़िल में भी वो बहका लगता है।।

बेटों का रस्ता जब माएँ तकती दिखती हैं।
उनसे पूछो त्योहारों में कैसा लगता है।।

जैसे तैसे कट जातें हैं दिन तो अपने ,पर।
शाम ढले यादों का तेरी जत्था लगता है।।

लाखों खुशियाँ हो दुनिया की सबके घर में,पर।
बेटी के बिन सबका आंगन सूना लगता है।।

जिसको देखो भाग रहा है उस से जाने क्यों।
शायद उसके हाथों में आईना लगता है।।

आँखों में बस क़ैद वही है सूरत अनजानी।
कोई मिलता वो मुझको बस अपना लगता है।

गौरव पांडेय रूद्र

Thursday, 12 January 2017

ग़ज़ल

रंजो ग़म में दिल मेरा उलझा हुआ है।
अश्क़ से तकिया तभी भीगा हुआ है।।

तू समझ पाये भी कैसे ये रवानी।
इश्क़ का दरिया तेरा सूखा हुआ है।।

साथ रहकर साथ वो क्योंकर नही था।
हर ज़ुबां पे ये सवाल आया हुआ है।।

ग़म मुझे दो और तुम हद से ज़ियादा।
क्योंकि ये चेहरा मेरा हँसता हुआ है।।

रास्ते भटकूँगा आख़िर क्यों भला मैं।
वक़्त का पहलू मेरा देखा हुआ है।।

पी के सब कड़वाहटें इस ज़िन्दगी की।
दोस्तों लहजा मेरा ऐसा   हुआ है।।

इस जहाँ की ये मुहब्बत देखकर भी।
रूद्र आँखों को मेरी ये क्या हुआ है।।

Tuesday, 10 January 2017

ग़ज़ल

ख़ुशनुमा मंज़र दिखाओ तुम ज़रा।
ज़ख़्म पर मरहम लगाओ तुम ज़रा।।

इन दिनों मैं हूँ मजे में बारहा।
दर्दो ग़म को पास लाओ तुम ज़रा।।

आँसुओं का यह समुन्दर बह सके।
दूरियां कुछ यूँ बढ़ाओ तुम ज़रा।।

मर रही इंसानियत के वास्ते।
आस का दीपक जलाओ तुम ज़रा।।

है नही मुमकिन हक़ीक़त में मगर।
ख़्वाब में तो आओ जाओ तुम ज़रा।

मुश्किलें आसान सब हो जाएंगी।
दो क़दम तो साथ आओ तुम ज़रा।।

मैं शुमार आदत में अपनी कर सकूं।
रूद्र कुछ ऐसा सिखाओ तुम जरा।।
गौरव पांडेय रूद्र

Monday, 9 January 2017

ग़ज़ल

अब तलक़ दिल में दबे अंगार तेरे शह्र में।
हो गए कुरबान  ये  घर-बार तेरे शह्र में।।

अम्न की दरकार का था मुद्दआ जिनका यहाँ।
आज उछली उनकी भी दस्तार तेरे शह्र में।।

मुद्दतों के बाद अश्क़ों ने दिखाया जोर भी।
एक जब सैलाब आया यार तेरे शह्र में।।

इक मुझे ही दफ़्न करके क्या मिलेगा यार,जब।
इश्क़ के लाखों भरे बीमार तेरे शह्र में।।

सजदा चौखट पर तेरी करके गया जो भी यहाँ।
कम नही उसका हुआ मेयार तेरे शह्र में।।

कब तलक़ ढकता रहेगा ज़ुल्म को परदे से तू।
हो कभी ये  जायेगा अखबार तेरे शह्र में।।

वहशतों के दौर में कैसे बचाऊं मैं अना।
हर गली,नुक्कड़ पे हैं बाज़ार तेरे शह्र में।।

Thursday, 5 January 2017

एक शेर

बख़ूबी   ग़म  को  मेरे  दूर से  पहचान  लेता  है।
वो कुछ इस तर्ह से ज़ख़्मों पे मरहम टांक देता है।।