थकान लोगो को बुजदिल बना के छोड़ेगी।
सफ़र की चाह को दिल से मिटा के छोड़ेगी।।
"ज़ोअफ़-ए-तालीफ़" शेर का एक ऐब
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शेर में कई बार लोग मुहावरों को तोड़ मरोड़ कर फिट कर देते हैं ताकि शेर बहर में दिखे। ऐसा करने से न सिर्फ़ शेर की खूबसूरती बिगड़ जाती है बल्कि वह शेर ज़ोअफ़-ए-तालीफ़ के अंतर्गत दोषपूर्ण माना जाता है।
मिसाल के तौर पर -
"नौ दो ग्यारह होना" को आप "सात चार ग्यारह होना" नहीं कर सकते वरना शेर इस ऐब की गिरफ़्त में आ जायेगा।
प्रायः लोग हिंदी/संस्कृत के शब्दों के साथ कठिन अरबी/फ़ारसी/उर्दू के शब्दों को इज़ाफ़त के ज़रिये मिला कर मुरक्कब लफ़्ज़ बना देते हैं, यह बेतरतीब शब्दों का संयोजन भी ज़ोअफ़-ए-तालीफ़ के तहत ऐब माना जाता है।
मसलन -
दर्दे-दिल (सहीह) ..... दर्दे-ह्रदय (ग़लत)
शबे-वस्ल (सहीह) ..... राते-वस्ल (ग़लत)
बज़्मे-अदब (सहीह) ..... बज़्मे-साहित्य(ग़लत)
कुंवर कुशमेश सर
ग़म की इतनी मेहरबानी हो गयी।
हर ख़ुशी ही आसमानी हो गयी।।
ज़िन्दगी ! जिस दिन समझ पाया तुझे;
इक शुरू फिर से कहानी हो गयी।।
मार डाला वक़्त ने क़िरदार को;
फिर कहानी बेज़ुबानी हो गयी।।
मैंने कल शब सब उम्मीदें छोड़ दीं;
ज़िन्दगी फिर रातरानी हो गयी।।
मेहरबां ! हम आ गए , अब यह करो;
चोट दो, वो तो , पुरानी हो गयी।।
ये मुसाफ़िर छोड़ बैठे हैं सफ़र;
मुश्किलें क्या फिर सयानी हो गयी।।
पहले दिल ने दिल को दी आवाज़, फिर;
इक अधूरी ज़िन्दगानी हो गयी।।
।।रुद्र।।
हिंदी और उर्दू ग़ज़ल के बीच कुछ विवादास्पद मसाइल
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अरबी,फ़ारसी और उर्दू से होते हुए ग़ज़ल हिंदी में भी अब बड़ी मजबूती से अपनी पैठ और पकड़ बना चुकी है। पिछले लगभग 3-4 वर्षों में एक से एक अच्छी गज़लें हिंदी रस्मुलख़त ( लिपि ) में पढ़ने को मिल रही हैं और ऐसी ही खूबसूरत ग़ज़लों के मज्मुए भी तेज़ी के साथ शाया हो रहे हैं। इन सब का श्रेय काफ़ी हद तक ग़ज़लकारों के साथ 2-3 वर्षों से प्रचलन में आये फिलबदीह चलाने वाले प्रबंध-तंत्र को भी जाता है जहाँ लोग तबअ आज़माई करते हैं। जदीद शायरी के इस बदलते दौर में ग़ज़ल ने अपने रिवायती लबो-लहजे के साथ अगर समझौता किया है तो भाषा तथा इल्मे-अरूज़ के नज़रिये से भी बहुत समझौते किये हैं। हालाँकि कई उस्ताद शायर कुछ के साथ तो खुलकर अपना ऐतराज़ जताते हुए दिखते हैं तो कुछ की तरफ ऊँगली उठाते हुए भी डरते हैं। इस पक्षपातपूर्ण रवैये का शिकार कुछ नए सीखने वाले होते हुए दिख रहे हैं, इसलिए यह ज़रूरी है कि इन बातों को साफ़गोई के साथ उठाया जाये।
1- न शब्द का वज़्न कुछ लोग 1 तथा कुछ लोग ना कहते हुए 2 को ठीक ठहराते हैं। हिंदी में न लिखा जाता है इस लिहाज़ से इसका वज़्न 1 हुआ मगर उर्दू में न लिखते वक़्त नून के साथ हे का इस्तेमाल होता है यानि उर्दू में न ऐसे ( نہ ) यानी ना लिखा जाता है। इन दोनों बातों के मद्देनज़र न को 1 तथा ना को 2 वज़्न पर बाँधना सहीह लगता है। लेकिन कुछ लोग इसका वज़्न 1 ही मानने पर अड़े हुए दिखते है यहाँ तक कि कुछ उर्दू दां भी, जबकि उर्दू में न के लिए सिर्फ नून लिखने का प्रावधान ही नहीं है। उनसे इस अड़ियल रवैये का कारण पूछा जाता है तो जवाब मिलता है कि मेरे उस्ताद ने यही बताया था। कोई तर्क नहीं दे पाते। है न अजीब बात। क्यों न ज़रुरत तथा तलफ़्फ़ुज़ के मुताबिक़ इसका वज़्न 1 या 2 दोनों स्वीकार किया जाए।
इस सम्बन्ध में एक उदाहरण भी देख ही लीजिये :-
इतना न दिल से मिलते,ना दिल को खो के देते।
जैसा किया था हमने वैसा ही यार पाया।
-मीर तकी मीर
इसमें न और ना दोनों का इस्तेमाल हुआ है
2- क़दीमी शायरी में शहर को शह्र पढ़ा जाता था तथा उच्चारण के आधार पर इसका वज़्न 21 लिया जाता था परन्तु इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में कोई उर्दू दां भी शहर का उच्चारण शह्र नहीं करता बल्कि सब शहर ही कहते हैं तो इसका वज़्न तलफ़्फ़ुज़ आधारित होने के कारण 12 लेने में ऐतराज़ क्यों। यही हाल ज़हर , बहर आदि अल्फ़ाज़ का भी है।
3 - लोग तक़ाबुले-रदीफ़ पर बड़ी हाय-तौबा मचाये हुए हैं आजकल। इस मुद्दे को एक उदाहरण से ही शुरू करते हैं।
मेरे ख़याल से जदीद शायरी के मशहूरो-मारूफ शायर मुनव्वर राणा साहब को आप सबने पढ़ा होगा जिनकी शायरी लोगों के दिलों पर राज कर रही है। उन्होंने तक़ाबुले रदीफ़ को बिलकुल सिरे से नकार दिया है। देखिये उनके कुछ अशआर :-
वो ग़ज़ल पढ़ने में लगता भी ग़ज़ल जैसा था।
सिर्फ ग़ज़लें नहीं लहजा भी ग़ज़ल जैसा था।
नीम का पेड़ था,बरसात थी और झूला था ,
गाँव में गुज़रा ज़माना भी ग़ज़ल जैसा था।
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समाजी बेबसी हर शह्र को मक़्तल बनाती है।
कभी नक्सल बनाती है कभी चम्बल बनाती है।
हवस महलों में रहकर भी बहुत मायूस रहती है,
क़नाअत घास को छूकर उसे मखमल बनाती है।
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ये उदाहरण ये साबित कर रहे हैं की ज़रुरत के मुताबिक़ जदीद शायरी में आयी हुई तब्दीली को भी खुले दिल से उस्ताद शायरों को आत्मसात कर लेना चाहिए।
बाते और भी हैं कहने के लिए लेकिन बाक़ी फिर कभी
साभार -कुँवर कुसुमेश सर
शेरो-शायरी में न और ना के इस्तेमाल पर बड़ी हाय तौबा मचाये हुए हैं बहुत से लोग। मैं अपने एक आलेख में पहले बता चुका हूँ कि हिंदी में तो न लिखा जा सकता है परन्तु उर्दू में न लिखते वक़्त ना ( نہ ) यानी नून के साथ हे मिलाकर ही लिखा जाता है। फिर न के लिए लघु तथा ना के लिए दीर्घ दोनों स्वीकार क्यों नहीं कर सकते।
जो लोग ना के प्रयोग को नकार दे रहे हैं वो ज़रा निम्न शेर भी देखें :-
-1-
इतना न दिल से मिलते,ना दिल को खो के देते ,
जैसा किया था हमने वैसा ही यार पाया।
-मीर तक़ी मीर
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-2-
गर उस तरफ़ बढ़ा किसी बेदादगर का हाथ।
बाला-ए-तन रहा न इधर ना उधर का हाथ।
-अनीस
सौजन्य से कुशमेश सर
तुम्हारी पलकें झुकी हुई हैं।
हमारी सांसे थमी हुई हैं।।
क़दम ज़रा सा बढ़ा के देखो।
हज़ार राहें बनी हुई हैं।।
टटोलते हो क्या आदमी में।
अनाएँ सबकी मरी हुई हैं।।
मरी कहाँ है अभी मुहब्बत।
अभी तो यादें जुड़ी हुई हैं।।
करम ख़ुदा का है इसमें क्या कम।
दुआएं मां की बनी हुई हैं।।
ख़ुदा के आगे मैं रो रहा, पर।
ख़ताएँ पहले जुड़ी हुई हैं।।
ग़ुरूर जिनपे तुम्हें है अब भी।
वो तोपें कब की दगी हुई हैं।।
।।रुद्र।।
दर्दो ग़म अब भी ज़रा मौजूद है।
इसलिये दिल मे ख़ला मौजूद है।।
बेवफ़ाई का सबब था साथ जो।
अब तलक़ वो दायरा मौजूद है।।
इन अँधेरों से निपटने के लिये।
रौशनी का एक दिया मौजूद है।।
यूँ नही कश्ती किनारे आ गयी।
उस पे तो कोई दुआ मौजूद है।।
बदगुमां नजरों से हैं सब देखते।
आखिर उसमे ऐसा क्या मौजूद है।।
ज़िन्दगी की ख़ुशमिजाजी जिंदा है।
जब तलक़ मुझमे हवा मौजूद है।।
फूल ,पत्ती ,चांद ,तारे कह रहें।
हो न हो कोई ख़ुदा मौजूद है।।