Thursday, 15 August 2019

ग़ज़ल

ग़म की इतनी मेहरबानी हो गयी।
हर ख़ुशी ही आसमानी हो गयी।।

ज़िन्दगी ! जिस दिन समझ पाया तुझे;
इक शुरू फिर से कहानी हो गयी।।

मार डाला वक़्त ने क़िरदार को;
फिर कहानी बेज़ुबानी हो गयी।।

मैंने कल शब सब उम्मीदें छोड़ दीं;
ज़िन्दगी फिर रातरानी हो गयी।।

मेहरबां ! हम आ गए , अब यह करो;
चोट दो, वो तो , पुरानी हो गयी।।

ये मुसाफ़िर छोड़  बैठे हैं सफ़र;
मुश्किलें क्या फिर सयानी हो गयी।।

पहले दिल ने दिल को दी आवाज़, फिर;
इक अधूरी ज़िन्दगानी हो गयी।।
।।रुद्र।।

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