Thursday, 29 August 2019

ग़ज़ल संबंधित जानकारी

"ज़ोअफ़-ए-तालीफ़" शेर का एक ऐब 
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शेर में कई बार लोग मुहावरों को तोड़ मरोड़ कर फिट कर देते हैं ताकि शेर बहर में दिखे। ऐसा करने से न सिर्फ़ शेर की खूबसूरती बिगड़ जाती है बल्कि वह शेर ज़ोअफ़-ए-तालीफ़ के अंतर्गत दोषपूर्ण माना जाता है।

मिसाल के तौर पर -

"नौ दो ग्यारह होना" को आप "सात चार ग्यारह होना" नहीं कर सकते वरना शेर इस ऐब की गिरफ़्त में आ जायेगा।

प्रायः लोग हिंदी/संस्कृत के शब्दों के साथ कठिन अरबी/फ़ारसी/उर्दू के शब्दों को इज़ाफ़त के ज़रिये मिला कर मुरक्कब लफ़्ज़ बना देते हैं, यह बेतरतीब शब्दों का संयोजन भी ज़ोअफ़-ए-तालीफ़ के तहत ऐब माना जाता है।

मसलन  -

दर्दे-दिल (सहीह)               .....                  दर्दे-ह्रदय (ग़लत)
शबे-वस्ल (सहीह)             .....                  राते-वस्ल (ग़लत)
बज़्मे-अदब (सहीह)          .....                  बज़्मे-साहित्य(ग़लत)

कुंवर कुशमेश सर

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