Thursday, 29 August 2019

ग़ज़ल संबंधित जानकारी

"ज़ोअफ़-ए-तालीफ़" शेर का एक ऐब 
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शेर में कई बार लोग मुहावरों को तोड़ मरोड़ कर फिट कर देते हैं ताकि शेर बहर में दिखे। ऐसा करने से न सिर्फ़ शेर की खूबसूरती बिगड़ जाती है बल्कि वह शेर ज़ोअफ़-ए-तालीफ़ के अंतर्गत दोषपूर्ण माना जाता है।

मिसाल के तौर पर -

"नौ दो ग्यारह होना" को आप "सात चार ग्यारह होना" नहीं कर सकते वरना शेर इस ऐब की गिरफ़्त में आ जायेगा।

प्रायः लोग हिंदी/संस्कृत के शब्दों के साथ कठिन अरबी/फ़ारसी/उर्दू के शब्दों को इज़ाफ़त के ज़रिये मिला कर मुरक्कब लफ़्ज़ बना देते हैं, यह बेतरतीब शब्दों का संयोजन भी ज़ोअफ़-ए-तालीफ़ के तहत ऐब माना जाता है।

मसलन  -

दर्दे-दिल (सहीह)               .....                  दर्दे-ह्रदय (ग़लत)
शबे-वस्ल (सहीह)             .....                  राते-वस्ल (ग़लत)
बज़्मे-अदब (सहीह)          .....                  बज़्मे-साहित्य(ग़लत)

कुंवर कुशमेश सर

Thursday, 15 August 2019

ग़ज़ल

ग़म की इतनी मेहरबानी हो गयी।
हर ख़ुशी ही आसमानी हो गयी।।

ज़िन्दगी ! जिस दिन समझ पाया तुझे;
इक शुरू फिर से कहानी हो गयी।।

मार डाला वक़्त ने क़िरदार को;
फिर कहानी बेज़ुबानी हो गयी।।

मैंने कल शब सब उम्मीदें छोड़ दीं;
ज़िन्दगी फिर रातरानी हो गयी।।

मेहरबां ! हम आ गए , अब यह करो;
चोट दो, वो तो , पुरानी हो गयी।।

ये मुसाफ़िर छोड़  बैठे हैं सफ़र;
मुश्किलें क्या फिर सयानी हो गयी।।

पहले दिल ने दिल को दी आवाज़, फिर;
इक अधूरी ज़िन्दगानी हो गयी।।
।।रुद्र।।