Monday, 23 April 2018

ग़ज़ल

दर्दो ग़म अब भी ज़रा मौजूद है।
इसलिये दिल मे ख़ला मौजूद है।।

बेवफ़ाई का सबब था साथ जो।
अब तलक़ वो दायरा मौजूद है।।

इन अँधेरों से निपटने के लिये।
रौशनी का एक दिया मौजूद है।।

यूँ नही कश्ती किनारे आ गयी।
उस पे तो कोई दुआ मौजूद है।।

बदगुमां नजरों से हैं सब देखते।
आखिर उसमे ऐसा क्या मौजूद है।।

ज़िन्दगी की ख़ुशमिजाजी जिंदा है।
जब तलक़ मुझमे हवा मौजूद है।।

फूल ,पत्ती ,चांद ,तारे कह रहें।
हो न हो कोई ख़ुदा मौजूद है।।

Thursday, 5 April 2018

ग़ज़ल

अश्क़ों से हम याद मिटाने बैठ गए।
तन्हाई में दिल समझाने बैठ गए।।

ख़ुद अपनी मंज़िल की जिनको ख़बर नही।
आज वही रस्ता बतलाने बैठ गए।।

वक़्त इजाज़त देता नही हमें फिर भी।
टूटे फूटे ख़्वाब सजाने बैठ गए।।

आँखे तो हैं ख़ुद ही दिल का आईना।
नाहक तुम यूँ राज़ छुपाने बैठ गए।।

इस मंज़र पर उसकी रहमत झूम उठी।
बच्चे माँओं के सरहाने बैठ गए।।

सात जनम की कसमें खाने की ख़ातिर।
पास में आकर दो अनजाने बैठ गए।।

साँझ ढले छाया है जब से सन्नाटा।
पक्षी भी घर में सुस्ताने बैठ गए।।